30-Jun-2012

रोज ढूँढता हूँ तुम को,
रोज गुम हो जाती हो..
क्या कहूँ तुम्हे..
वरदान, अभिशाप
एक अनउतरीत सवाल
अधूरा गीत,अधूरा सच
क्षितिज,धरती,आकाश
मिथ्या,अटल विश्वास
गहरा द्वेष,असीम प्रेम
खुली आँखों के ख्वाब

कवि की कल्पना
जेहन में अचानक झांकती
कविता के शब्द ..
पेड़ पर चहचहाते पंछी
पत्तियों की सरसराहट
टहनियों की हलचल
समंदर का किनारा
जिस से  लहरें टकराती हैं
और लौट आती हैं
मंदिर में सुनाई दे वाली
मधुर घंटी की आवाज
जो तृप्त करती है आत्मा को,
या एक जीवन्त पल||

नहीं जानता हश्र क्या होगा ???
इसीलिए रोज ढूँढता हूँ तुम को
की जिन्दगी को एक ख़ूबसूरत गीत बनाऊंगा
पूरा ना कर सका ,ना सही
अधुरा ही तुम्हारे साथ गुनगुनाउंगा...


"अम्बरीष"

25-Jun-2012

 

मेरी डायरी के उन दो पन्नों
को निहारता हूँ रोज
जिस पर लिख दिया है
तुमने कुछ शब्द मेरे लिए
तुम्हारी मोतियों की तरह
दिखने वाली लिखवाट
खुद को तुम्हारे करीब
होने का एहसास दिलाते हैं


कभी-कभी ग़ौर से हर शब्द को
पढ़ने की कोशिश करता हूँ
अब भी लगता है की
जैसे कुछ देर पहले ही
तुमने लिखा है मेरे लिए
तुम्हारे लम्स की गर्माहट
अब तक उस डायरी में मौजूद है ...!!!


11-Jun-2012

मन में पीड़ा है, बेचैनी है, द्वंद् है, ईर्ष्या है अब क्योंकि जो है वही बाहर आएगा एहसास इतना घनीभूत और प्रबल हैं की अंतरात्मा पर वश ही नहीं होता, धड़कने जैसे रुक रुक कर चलती हैं, दिल में हमेशा एक शूल सा धंसा रहता है | बहुत कोशिश की इस मानसिक असंतुलन से खुद को उबार लूं और सामन्य हों जाऊं कई उपाय किये और कई बार महसूस भी हुआ की अब घुल गयी है पीड़ा की कुछ सर्द लकीरें मेरे अंतरमन में किन्तु अंततः सब धाराशाई हो गए और मैं लौट कर वापस आ जाता हूँ उसी मनोस्तिथि में | काश हमारे शारीरिक तंत्रजाल में भी माइक्रोसाफ्ट विंडोस़ की तरह एक निश्चित रिस्टोर पॉइंट पर खुद को रिस्टोरे करने की क्षमता होती तो शायद मैं इस वेदना के एहसास को मिटा सकता, इश्वर से यही शिकायत है, उन्हें बिल गेट्स से थोड़ा सबक लेकर इस सम्बन्ध में थोड़ा विचार करना चाहिए| कितनी सामन्य रूप से जिए जा रहा था जिंदगी यदि कोई हर्षोल्लास नहीं था तो बहुत गम भी नहीं था लेकिन नहीं रास नहीं आ रही थी यूँ नीरस होकर जीने की ये अस्वभाविक प्रक्रिया| इंसानी फितरत हम परिवर्तन चाहते हैं, खुशियाँ चाहिए, प्रेम चाहिए, जीत चाहिए और सबसे ऊपर कुछ अधिक आदर्शपूर्ण स्थिती चाहिए, महत्त्वपूर्ण होने का एहसास कैसे जाने दे सकते हैं | जीत मिली पर हर जीत में हारता रहा , प्रेम मिला किन्तु बड़ा ही निष्ठुर और खुशियाँ मिली कुछ पल के लिए पर जाते जाते विष ही छोड़ गईं | एक परम दयालु मित्र की कृपा से एक नाटक देखने का अवसर प्राप्त हुआ नाम था "जाती ही पूछो साधू की" यह एक व्यंग था हमारे समाज के ठेकेदारों द्वारा बनाये गए उलटे और पूर्णतया खोखले बेबुनियादी नियमों पर | नाटक का नायक प्रोफ़ेसर महिपत बब्रुआहन (ऍम. ए. ,तृतीय श्रेणी) से मैंने कुछ सीख ली और घर आकार सोचा की अब मैं थोड़ा ठीक हूँ, लेकिन ये तृष्णा इतनी आसनी से कहाँ मिटेगी ये क्षण-भंगुर नहीं है | फेसबुक पर सभी मित्रों के साथ अपनी मानसिक व्यथा व्यक्त करके किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं बटोरना चाहता हूँ , साझा इसलिए कर रहा हूँ क्यूंकि हम सब किसी ना किसी प्रकार की मानसिक ,शारीरिक यंत्रणा से कभी ना कभी अवश्य गुजरते हैं और इससे निजात पाने के लिए कोई ना कोई उपाय जरुर करते हैं तो मैं भी बस वही कर रहा हूँ इसे लिख कर और सबके साथ बाँट कर, लिखते हुए इस बात का एहसास है की जीवन में संघर्ष हम सब के साथ है और सबको उसका अपना  दुःख दूसरे से ज्यादा लगता है, मेरी कोशिश भी यही रहेगी की जितनी जल्दी हों सके फिर से अपनी पुरानी जिंदगी में वापस चला जाऊं या इस दुनिया के रंग में रंग जाऊं और सही बताऊँ तो रंगना भी चाहता हूँ  है पर अपने संस्कारों को ताक पर रख कृत्रिमता का आडम्बर रच कर नहीं |


24-May-2012

         माँ तेरी गोद में सर रख कर
         सो लेना चाहता हूँ
         कई सदियों से
         आँखें जल रही हैं
         तेरी आँचल में छुप कर
         जी भर के
         रो लेना चाहता हूँ
         तेरे स्नेह भरे हाथों का
         स्पर्श चाहता हूँ
        माँ मैं थोड़ा सा
        जी लेना चाहता हूँ...

23-May-2012

मन करता है क्रोध करूं तुम पर
पर आता ही नहीं,

 उमड़ पड़ता है अथाह प्रेम
 तुम्हारी सुन्दर सलोनी छवि
कर जाती है स्पंदित मन को
जीवित हों उठता है अंतर्मन
सुकून दे जाता है कुछ पल को ,
तुम्हारे साथ होने की 

कल्पना मात्र ही रंग जाती है
मुझे प्यार के चटख गहरे रंग में
सब मीठा-मीठा सा लगता है
कर्णप्रिय मधुर संगीत 

बजने लगती है मन में ...
प्रेम के एहसासों से लबरेज मन
समंदर के गहराई में सुदूर कोने से
सीपियाँ बटोर लाता है
और फिर अचानक ही मन
काँप उठता है, शांत हों जाता है

डर जाता है इस एहसास
के खो जाने से |

14-May-2012


                   दीवार पर कितनी
                   मासूमियत लिए बैठी है,
                   मन भीगा हुआ है
                   लबों पर प्रेम की
                   भावुक अभिव्यक्ति है
                   जिसे शायद व्यक्त करना
                   चाह तो रही है पर,
                   प्रेम के स्फुटन को सामने
                   लाने से हिचक रही है|
                   कभी-कभी अपलक
                   देखने लगता हूँ उसे,
                   वो बार-बार नजर
                   आ जाती है पर चुप
                   शायद सोचती है की
                   प्रेम में जो गोपन है
                   वही मुखर है
                   मैं व्याकुल हो उठता हूँ
                   और वो नजरों से
                   दूर चली जाती है सुदूर में...
                   पलक जो कहीं
                   झपक भी जाती है
                   तो मैं उठ बैठता हूँ
                   कहीं मुझे सोया
                   देख कर वो
                   चली न जाए ....
                   सपने और सच
                   की जुगलबंदी
                   यूँ ही बदस्तूर जारी है .......
                   अभी भी जग रहा हूँ
                   उसी के इन्तजार में |

15-Mar-2012

 छुट कर भी
 नहीं छूटते
 कुछ रिश्ते 
जीवन में,
 हमेशा कुछ 
गांठों को 
खोलने के
 फिराक में 
रहता हूँ
लेकिन हर
 गाँठ के साथ 
डोर छोटी होती
चली गयी.....
 

28-Feb-2012

                   "अधूरी कविता"

रात गुज़ार दी कविता के शब्दों के साथ
सुबह ने जाने कब दस्तक दे दी,
 अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी
मैं खोया रहा अपने भूत, वर्तमान, भविष्य की कविता में |

नींद काफूर है आँखों से,
शब्द वाक्य, और वाक्यों ने धर  लिया है रूप कविता का
शब्दों को सजाया था रात भर मैंने
 पिरोया था बखूबी एक-एक करके |

ना जाने क्यूँ फिर भी लगा जैसे,
 कहीं कुछ छूट गया है
 बिखर गया है
 रह गयी मेरी कविता पूरी होने से
अभी भी ये अधूरी है.......

“अम्बरीष”





25-Dec-2011

     कल रात कोई
     ख्वाब नहीं देखा
     क्यूँ की अब मैंने ख्वाबों
     को बुनना छोड़ दिया
     मैं जुलाहे से भी नहीं
     पूछता कोई तरकीब,
     क्यूंकि मैंने रिश्ते
     बुनना भी छोड़ दिया...
मन ! तेरी गति कितनी विचित्र है, कितनी रहस्य से भरी हुई, कितनी दुर्मेध | तू कितनी जल्दी रंग बदलता है | इस कला में तू निपुण है | आतिशबाज की चरखी को भी रंग बदलते कुछ देर लगती है, पर तुझे रंग बदलने में उसका लक्षांश समय भी नहीं लगता !

मुंशी प्रेमचंद की निर्मला पढ़ रहा हूँ, करीब ५ साल पहले आधी पढ़ी थी और पुस्तक एक महिला मित्र ने रख ली थी और विडम्बना ये की उन्हें पुस्तकों से कोई लगाव भी नहीं था |पूछ नहीं पाया की उन्होंने मेरी अधूरी पढ़ी पुस्तक को पूरा पढ़ा या नहीं |

01-Sep-2011



कुछ टूटता सा
महसूस हो रहा है ,
अन्दर कुछ
काप रहा है
मन अशांत है,
ढूँढने वाले इसमें
करुणा भी ढूँढ़ लेंगे 
भय भी
साहस भी
और किसी सीमा तक
भविष्य भी....

23-Aug-2011

                          शत-शत नमन...



घर का सबसे मजबूत स्तम्भ अब नहीं रहा, इस स्तम्भ ने पूरे घर को यूँ  थाम  रखा था जैसे एक माँ अपने अबोध बच्चे को अपने गोद में रखती है और बच्चा भी अपने को सबसे ज्यादा महफूज इस गोद में ही पता है | १६ अगस्त को  घर पर बैठा लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था की अचानक गूगल टॉक पर हमारे एक पुराने मित्र सिद्धार्थ  का पिंग आया जिसे मैं पिछले काफी दिनों से संपर्क करने की कोशिश कर रहा था और वो जबाब नहीं दे पा रहा था |  खबर उससे  सुनी तो  सहसा विश्वास ना हो सका.. उसने बताया की उसके पापा अब हमारे बीच नहीं रहे.. उस समय  मेरे पास कोई शब्द नहीं थे  मुझे शब्दों में किसी का दुःख बांटना नहीं आता है, सो मूक श्रद्धांजलि ही सही | अंकल से पहली बार गोरखपुर में मुलाकात हुई थी कितने ही ससक्त और मजबूत इरादों के इंसान थे, उनके चेहरे पर हलकी झुर्रियां तो जरूर थी किन्तु चेहरे के तेज में जैसे वो छुप गया हो | सिद्धार्थ के परिवार  में लगभग सबको जानता हूँ, लगभग इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकि यह एक संयुक्त  परिवार है और इस परिवार में कुल कितने सदस्य हैं ये शायद मुझे नहीं पता | सिद्धार्थ के घर (कुशीनगर) जाने का अवसर मुझे एक ही बार मिला और मुझे याद है की कितने प्रेम से  सभी ने मेरा स्वागत  किया था,और मेरा मन गदगद हो गया था | मुझे आपसी प्रेम औए सौहार्द्य  का एक सबक तो इस परिवार से ही मिला| उस घर से मेरा एक अजीब ही रिश्ता है, मैं उन लोगों के बहूत ही करीब होने का दंभ तो नहीं भर सकता किन्तु एक डोर है जो मुझे हमेशा उन लोगों से जोड़े रखती है| मुझे पता है सिद्धार्थ इस समय कितना दुखी होगा और साथ में घर के बाकी सदस्य भी | मैं इस पोस्ट के जरिये अंकल को अपनी श्रद्धांजलि देना चाहता  हूँ , कहना चाहता हूँ की आप एक बहूत ही अच्छे और सफल इंसान थे  और इस  समाज के लिए एक प्रेरणाश्रोत भी| हम सभी को आप पर बहूत ही गर्व है और मुझे पूरा विशवास है की  सिद्धार्थ भी आपके ही नक़्शे-कदम पर चलते हुए आपके सपने को जरुर साकार करेगा| मैं इस पोस्ट को लिखते   हुए बहूत ही भावुक हो गया हूँ और ज्यादा  शब्दों  को समेट नहीं पा रहा हूँ, अंकल को मेरे तरफ से भाव-भीनी श्रदांजली और  मैं आपको शत-शत नमन करता हूँ |


17-Jun-2011

ढूढंता है ...

अब अपने किराये के कमरे को ही घर कहता हूँ
मेरा घर भी अब मेरी ही तरह खो चूका है अपनी पहचान
घर में अब कोई नहीं रहता, वहां अब ख़ामोशी बसती है, अँधेरा जगमगता है
वो कमरें जो गूंजती थी किलकारियों से रौशन होती थीं ठहाकों से और महकती थीं मोहब्बत से
अब तब्दील हो गयी हैं थार के रेगिस्तान में

एक बुड्ढा अब भी रहता है वहां, यह वही बुड्ढा है
जिसने ढ़ोया है इस घर को अपने मजबूत कन्धों पर
वो कंधें अब झुक गए हैं और घर भी उन कन्धों को छोड़ गिरने को आतुर है

यह बुड्ढा कभी एकदम जवान था
उम्र तो तब भी थी उसकी अस्सी की
पर जवानी जो बसती थी उन्ही किलकारियों,हंसी,ठहाकों
और हंसी से लबरेज़ घर की दीवारों में
वो शायद जा चूँकि हैं या खो गयी हैं
बुड्ढा अब ढूँढता भी नहीं उन्हें
उसे यकीन ही नहीं होता की अब नहीं रहा अस्तित्व उनका

पर हाय रे वात्सल्य!
हाय रे प्रेम
अडीग,अस्थिर,अविचल सा पड़ा है
हाँ अब बस साँसे ही बाकी रह गई हैं
पर फिर भी है उसे उम्मीद
आज भी ढूँढता है क़दमों के निशाँ
कोशिश करता है सुनने की हर वो आहट
जिससे गुमाँ होता है उन खनकती आवाजों का
उन किलकारियों का ...

शायद चाहता है किसी के प्राणमयी प्रेमालिंगन को
जो उसे फिर से जिवीत कर दे

01-Jun-2011



"मेरे स्कूटर की पिछली सीट"

मेरे स्कूटर की पिछली सीट बहूत ही याद आती है,
उस पर बैठ कर कितना खुश होता था मैं 
आज उस स्कूटर के आगे की सीट मेरी हो गयी है
और पीछे की सीट हमेशा खाली रहती है
इसे भी मेरी कमी कहीं ना कहीं महसूस होती है ॥ 

इस स्कूटर को पापा चलते थे और मैं पीछे बैठा 
थोडा तेज चलो ना पापा के राग अलापता रहता था, 
बेटा इससे तेज नहीं चला सकता तुम गिर गए तो
गिरूंगा कैसे मैंने आपको कस के पकड़ा है छोडूंगा नहीं

पापा जाते-जाते विराशत में इसे मेरे लिए छोड़ गए
इसके साथ कितनी ही अच्छी और सुखद यादें जुडी हैं 
अनायास ही ये यादें कभी कभी यूँ फूट पड़ती हैं
पलकें नम हो जाती हैं और मैं रुंवासा हो जाता हूँ
पता ही नहीं चलता ॥ 

स्कूटर के पीछे बैठे
पापा की कितनी बातों को तो ध्यान ही नहीं देता था 
लेकिन वो हमेशा मुझे जिंदगी के
अच्छे बुरे पहलुओं से परिचय करवाते रहते थे
मैंने जिंदगी को हमेशा खिड़की के 
दूसरी तरफ से देखने की कोशिस की 
आज जिंदगी को खिड़की के तरफ से देखता हूँ 
तो पता हूँ की पापा की बातें कितने सही थे





24-Jan-2011

"अस्तित्व"

तू भ्रम है या मेरी सच्चाई
नहीं जानता ,
हर पल साथ रहती है
ख़ामोशी में भी कुछ कहती है

महसूस करता हूँ तुझे
हर पल -हर क्षण ,
निष्पलक ये आँखें तलाशती हैं
तेरा अस्तित्व,
मृगतृष्णा की भाँती
क्यूँ तू मुझे आस-पास होने का आभास दिलाती है

तू कहती है
मैं उन्मुक्त हूँ
बादल की भाँती,
स्वन्त्रत हूँ
समुद्र की लहरों की तरह,
चंचल हूँ
अबोध बालक जैसे,
उन्मादित हूँ
यौवन की नित्यलीला सी
मुझे वरण करना संभव ना होगा

किन्तु मेरे लिए तू सच्चाई है
भ्रम नहीं,
कामना किया है
तुझे ही वरण करूँगा
तेरे इस रूप को अंगीकार करूँगा

पराजित हूँ
ह्रदय प्रेम के आगे,
तू मेरी ज्योत्स्ना बन
कर मुझे प्रज्वलित

तू मेरी विस्तृत व्याख्या है
मेरे अस्तित्व में ,
तू मुझे सम्पूर्ण कर

24-Jul-2010

"तुम्हारे बाबा"

तुम्हारे बाबा अब ठीक नहीं हैं
सारी यादें अब उनकी खो गयी हैं
बस तुम ही याद आते हो
वह कुछ नहीं करतें
बस तुम्हे याद करते हैं

ना शब्द कोई शेष बचे हैं
ना भावनाएं कोई व्यक्त करने को
बस तुम्हे याद करते हैं
छियासी वर्ष के हो चले हैं
पर अब व्यक्त भाव हैं
छह वर्ष के बालक से


तुम्हे पुकारते हैं
तुम्हे चाहते हैं
सारा परिवार पास है
तुम्हारी कमी खलती
अरसा हो गया
तुम गए, ना आये
तुम्हे किसी ने वनवास नहीं दिया
तुम गए थे
एक आज्ञाकारी पुत्र की भाँती
अब तुम बड़े हो चुके हो

तुम्हारे भी
एक सुन्दर बेटा है
वह तो खाली मन से हैं
बच्चों की तरह खेलते हैं
हमेशा ढूँढ़ते हैं
अपने मनीष को
वह तुम्हे शायद अब
अपनी बात ना व्यक्त कर पायें
ना समझा पाएं
पर तुम्हारी जरुरत है उन्हें

वह तुम्हे मिलने को आतुर हैं
हर पल, हर लम्हा
आओ उन्हें मिल जाओ
जैसे तुम बिछड़े ही नहीं

शायद तुम्हे भी सुकून मिले
तुम्हारी भी पीड़ा कम हो जाए
शायद तुम भी जी उठो एक बार फिर ....