03-Nov-2008

कविताएँ...

तो लीजिये आपका अभिनन्दन करता हूँ १ जनवरी 2००६ को लिखी मेरी कविता से--





                "नव वर्ष"


नया वर्ष सपने से होने वाली नई शुरूवात के नाम
पराजय की राख से जनमते संकल्पों के नाम
अँधेरे समय में जीवित ह्रदय की कविता के नाम
दूर तक फैली रेत पर पनपते कोम्पलो और फुनगियों के नाम
सृजन के नई परियोजनाओ के नाम
विश्वास से उठे सफलता के पहले कदम के नाम
पंख फैलाये उड़ने को आतुर हमारी कल्पनाओं के नाम
चन्दन,मनी,सिद्धार्थ,मनोज,अलोक,,भूपेन,नीरज,पवन,
सुदीप्त,विशाल जैसे प्यारे दोस्तों के नाम,
दृढ संकल्पित हो एक दुसरे का साथ देने के नाम
अंततः दोस्ती के पावन रिश्ते के नाम





 "घर"


जिंदगी फूलों से सजी है किसी की
तो खुशियाँ किसी के दामन में
पर जिसे काटों ने घेरा है
वह घर मेरा है
कहीं जोश तो उमंगें हैं कहीं पर
कहीं रंगों से भरी दुनिया है
पर जहाँ निरसता का डेरा है
वह घर मेरा है
आशओं के दीप जले हैं हर दिल में
कहीं रौनक है त्योहारों की
पर जहाँ निराशा का अँधेरा है
वह घर मेरा है
मदमस्त होकर हवायें फिरती हैं
दिन निकलता है फिर ढलता है
पर जहाँ काली रात का बसेरा है
वह घर मेरा है
सूरज की किरणे विकीर्ण होती हैं
पक्षी चाह्चाहातें हैं पुष्प खिलते हैं
पर जहाँ ना कोई सवेरा है
वह घर मेरा है
इंसान मरते हैं तो रिश्ते बदलते हैं
कुछ होता है तो नया कुछ मिलता है
पर जहाँ सिर्फ इन्तजार सिर्फ तेरा है
वह घर मेरा है







"कविता"



कविता में भविष्य के बयां इतने साफ़ हो,
जैसे अतीत की स्मर्तियाँ,
स्वप्न हो, जैसे भूद्र्श्य,
सौंदर्य, जैसे अधूरी कामना,
आकर्षण की हर जीवित ह्रदय को आमंत्रण दे,
आओ मुझे खोलो परत-दर-परत,
और पढ़ते चले जाओ, जैसे कोई अंत ही ना हो






"आगमन"


तेरा आज इस तरह आना
कर गया सबको अचन्भित
मैं भी हुआ स्पंदित
दिल को हुई ढेर सारी खुशियाहाँ
हाँ परन्तु हुआ थोडा गम मन में आया विचार
खड़े हो गए एक साथ कई कई सवाल
कैसे करू तेरे आगमन पर त्यौहार
भ्रम कही सच ना हो जाए, तू कही रूठ ना जाये
अपने सारे छुट ना जाये डरता हूँ फिर भी करता हूँ
एक मूक सवाल क्या यह तेरा ही आगमन है??

1 comment:

priyasha said...

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