05-Nov-2008

आइये आपको सैर कराते हैं गौतम बुद्ध की नगरी कुशीनगर की




कहानी कुशीनगर की---
तथागत, भगवान राम, अज्ञेय, राहुल सांस्‍कृतायन तथा कुशीनगर की भूमि। प्राचीनकाल के सोलह महाजनपदों में से एक ‘कुशीनारा’ (आज का कुशीनगर) अपने प्राचीन, वैभवशाली, धर्म और शांति के लिए विश्‍व के धार्मिक मानचित्र पर विशिष्‍ट स्‍थान रखता है। रामायण काल में भगवान राम के पुत्र कुश की राजधानी कुशावती को 483 ईसा पूर्व बुद्ध ने अपने अंतिम विश्राम के लिए चुना। मल्‍लों की राजधानी होने के कारण प्राचीनकाल में इस स्‍थान का अत्‍यंत महत्‍व था। बौद्ध धर्मावलंबियों के अनुसार लुंबनी, बोधगया और सारनाथ के साथ ही इस स्‍थान का विशद् महत्‍व है।

कुशीनागर का नाम कुशीनगर क्यों पड़ा इसकी एक रोचक कथा है। वही कथा यहाँ प्रस्तुत करने जा रहा हूँ मल्लदेश के राजा की कोई संतान नहीं थी। इन्द्र ने एक बार उनकी पटरानी शीलवती पर प्रसन्न हो दो पुत्रों का वर प्रदान दिया। पहला पुत्र बिल्कुल कुरुप था; किन्तु समस्त विद्याओं का ज्ञाता। दूसरा पुत्र बहुत ही खूबसूरत था; किन्तु बिल्कुल बुद्धिहीन।कुश एक कुशाग्र बुद्धि का व्यक्ति था। वह जानता था कि उसकी बदसूरती को देख कोई भी कन्या उससे विवार करना नहीं चाहेगी। फिर भी शीलवती के आग्रह से उसने विवाह करना स्वीकार किया और प्रभावती नाम की एक बहुत ही सुन्दर कन्या से उसकी माता ने उसका विवाह करवा दिया जो सागल देश की राजकुमारी थी।कुश के असल रुप को छुपाने के लिए शीलवती ने प्रभावती से झूठ कहा कि उसकी पारिवारिक परम्परा के अनुरुप प्रभावती और कुश एक दूसरे को तब तक प्रकाश में नहीं देखेंगे जब तक उनका बच्चा गर्भस्थ नहीं होता।कुछ दिनों के बाद कुश के मन में प्रभावती को देखने की इच्छा उत्पन्न हुई। उसने अपने मन की बात अपनी माता के बताई। माता ने उसे घोड़ों के अस्तबल में प्रभावती को दिखाने की योजना बनाई। अस्तबल में बैठे एक सारथी के भेष में कुश ने जब प्रभावती को देखा तो उसे एक शरारत सूझी। उसने प्रभावती पर पीछे से घोड़े की लीद फ्ैंकी। प्रभावती क्रुद्ध हुई, किन्तु शीलवती के कहने पर वह फिर आगे बढ़ गयी।इसी प्रकार कुश ने दो-तीन बार अपनी माता की सहायता से प्रभावती को देखा और जितना ही वह उसे देखता उतना ही उसे और देखना चाहता। अत: एक बार माता ने प्रभावती को कमल के जलाशय में भेजा, जहाँ कुश छुपा बैठा था। जब जलाशय में प्रभावती नहाने लगी तो कुश का धैर्य छूट गया। वह तैरता हुआ प्रभावती के पास गया और उसके हाथ पकड़ कर अपना भेद खोला डाला कि वही उसका पति था। उस कुरुप और प्रेत की शक्ल वाले कुश को देख प्रभावती मूर्व्हिच्छत हो गयी। जब उसे होश आया तो वह तत्काल अपने मायके चली गयी।कुश भी उसके पीछे-पीछे उसे मनाने गया और सागल देश में कई प्रकार की नौकरियाँ की। जब वह टोकरी बनाने का काम करता तो प्रभावती को अपना प्रेम-संदेश टोकरी की कलात्मकता के साथ भेजता। कभी कुम्हार बनता तो अपने हाथों की कलात्मकता से अपना संदेश भेजता। फिर भी प्रभावती उससे घृणा करती रही। अंतत: उसने प्रभावती के घर में रसोईये के रुप में काम कर हर किसी का दिल जीता। फिर भी प्रभावती उससे घृणा करती रही।एक दिन आठ देशों के राजाओं ने मिलकर सागल पर चढ़ाई की। तब कुश ने अपने ससुर के सामने प्रकट होकर सागल को बचाने का प्रस्ताव रखा। अपने जमाई राजा को वहाँ उपस्थित देख सागलराज बहुत प्रसन्न और आश्चर्य-चकित हुए। जब उन्होंने कुश को अपनी पुत्री के प्रेम में हर प्रकार का संघर्ष करते देखा तो उससे वह बहुत प्रभावित हुआ। उसने प्रभावती को फिर अच्छी फटकार लगाते हुए कुश की प्रशंसा की। प्रभावती ने भी उस संकट की घड़ी में कुश के गुणों को स्वीकारा और सराहा।कुश के साथ फिर आठ राजाओं की लड़ाई हुई। कुश ने उन आठ राजाओं को पराजित कर उनसे प्रभावती की आठ छोटी बहनों का ब्याह करवा दिया। फिर खुशी-खुशी प्रभावती के साथ मल्लदेश को लौट गया। तभी से मल्लदेश का नाम उसी पराक्रमी राजा कुश के नाम पर पड़ा।


तो चलिए अब सैर करते हैं इस पवित्र नगरी की----
यदि आप अक्टूबर या नवम्बर के महीने में यहाँ आते हैं तो कुदरत की मन मोह लेने वाली हरियाली आपका स्वागत करेगी मिटटी की सौंधी खुशबू के साथ--
कुशीनगर की सीमा में प्रवेश करते ही भव्‍य प्रवेशद्वार आपका स्वागत करता है। इसके बाद आम तौर पर पर्यटकों की निगाह महापरिनिर्वाण मंदिर की ओर पड़ती है। वैसे दूर से ही दिखता पैगोडा अपने सुनहरे आकर्षण के कारण सभी का मन मोह लेता है।
धार्मिक स्थान:-
१. महापरिनिर्वाण मंदिर -
कुशीनगर का महत्‍व महापरिनिर्वाण मंदिर से है। इस मंदिर का स्‍थापत्‍य अजंता की गुफाओं से प्रेरित है। मंदिर के डाट हूबहू अजंता की गुफाओं के डाट की तरह हैं। इस मंदिर में भगवान बुद्ध की लेटी हुई (भू-स्‍पर्श मुद्रा) 6 मीटर लंबी मूर्ति है, जो लाल बलुई मिट्टी की बनी है। यह मंदिर उसी स्‍थान पर बनाया गया है, जहाँ से यह मूर्ति निकाली गई थी। मंदिर के पूर्व हिस्‍से में एक स्‍तूप है। यहाँ पर भगवान बुद्ध का अंतिम संस्‍कार किया गया था। मूर्ति भी अजंता के भगवान बुद्ध की महापरिनिवार्ण मूर्ति की प्रतिकृति है। वैसे मूर्ति का काल अजंता से पूर्व का है। करीब 2500 वर्ष पुरानी मूर्ति।

इस मंदिर के आसपास कई विहार (जहाँ बौद्ध भिक्षु रहा करते थे) और चैत्‍य (जहाँ भिक्षु पूजा करते थे या ध्‍यान लगाते थे) भग्‍नावशेष और खंडहर मौजूद हैं जो अशोककालीन बताए जाते हैं। मंदिर परिसर से लगा काफी बड़ा सा पार्क है, जहाँ पर्यटकों को जमावड़ा लगा रहता है। वैसे इस पूरे परिसर में अलौकिक शांति का वातावरण है। सुबह और शाम सुगंधित अगरबत्‍तियों और बुद्धम् शरणम् गच्‍छामि के घोष से वातावरण और भी पवित्र और शांतिदायक लगता है।

२. माथा कुँवर मंदिर-

महापरिनिर्वाण मंदिर से कुछ दूर आगे माथा कुँवर का मंदिर है। इसके स्‍थानीय लोगों में भगवान विष्‍णु के अवतार होने की मान्‍यता भी प्रचलित है। इस मूर्ति के भी करीब पाँच सौ वर्ष पुराना होने का प्रमाण मिलता है। माथा कुँवर की मूर्ति काले पत्‍थर से बनी है। इसकी ऊँचाई करीब तीन मीटर है। मूर्ति भगवान बुद्ध के बोधि प्राप्‍त करने से पूर्व की ध्‍यान मुद्रा में है।

३. रामाभार स्‍तूप-

भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद 16 महाजनपदों में उनकी अस्‍थियों और भस्‍म को बाँट दिया गया। इन सभी स्‍थानों पर इन भस्‍मों और अस्‍थियों के ऊपर स्‍तूप बनाए गए। कुशीनगर में मौजूद रामाभार का स्‍तूप इन्‍हीं में से एक है। करीब 50 फुट ऊँचे इस स्‍तूप को मुकुट बंधन विहार कहा जाता है। हालाँकि स्‍थानीय वाशिंदों में यह रामाभार स्‍तूप के नाम से ही आज भी जाना जाता है।

४. जापानी मंदिर-

महापरिनिर्वाण मंदिर के उत्‍तर में मौजूद जापानी मंदिर अपनी विशिष्‍ट वास्‍तु के लिए प्रसिद्ध है। अर्द्धगोलाकर इस मंदिर में भगवान बुद्ध की अष्‍टधातु की मूर्ति है। मंदिर सुबह 10 से शाम 4 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है। मंदिर के चार बड़े-बड़े द्वार हैं, जो सभी दिशाओं की ओर बनाए गए हैं। इस मंदिर की देखरेख जापान की एक संस्‍था की ओर से की जाती है।

५. संग्रहालय-

जापानी मंदिर के ठीक सामने संग्रहालय है। इसमें बुद्धकालीन वस्‍तुओं, धातुओं, कुशीनगर में खुदाई के दौरान पाई गई मूर्ति, सिक्‍के, बर्तन आदि रखे गए हैं। इसके साथ ही मथुरा और गांधार शैली की दुर्लभ मूर्तियाँ भी यहाँ देखने को मिलेंगी।

6. वाट थाई मंदिर-

वर्तमान में सबसे आकर्षण का केंद्र यहाँ पर हाल ही में निर्मित वाट थाई मंदिर है। मंदिर का निर्माण थाईलैंड सरकार के सौजन्‍य से किया गया है। सफेद पत्‍थरों से बने इस मंदिर के दो तल हैं। निचला तल बौद्ध भिक्षुओं के ध्‍यान और साधना के लिए है, वहीं दूसरा, ऊपरी तल सभी पर्यटकों के लिए खुला है। इस मंदिर में थाई शैली की भगवान बुद्ध की अष्‍टधातु की मूर्ति है। मंदिर का वास्‍तु थाईलैंड के मंदिरों जैसा ही है। इसकी संरक्षिका थाईलैंड की राजकुमारी हैं। मंदिर के शीर्ष पर सोने की परत लगाई गई है। साथ परिसर के चारों ओर भव्‍य बागवानी की गई है। पौधों का विशेष आकार भी पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। मंदिर परिसर में मौजूद चैत्‍य सभी के आकर्षण का केंद्र बन जाता है। लोग बरबस इस सोने की परत चढ़े चैत्‍य के साथ फोटो खींचना चाहते हैं।

७. चीनी मंदिर-

कुशीनगर के विस्‍तार के साथ ही यहाँ पर सबसे बनाए गए मंदिरों में से एक चीनी मंदिर है। मंदिर में भगवान बुद्ध की मूर्ति अपने पूरे स्‍वरूप में चीनी लगती है। इसकी दीवारों पर जातक कथाओं से संबंधित पेंटिंग अत्‍यंत ही आकर्षक है। मंदिर के बाहर सुंदर फव्वारा है। साथ ही लगा एक विहार है।

८. जल मंदिर और पैगोडा-

महापरिनिर्वाण मंदिर से पहले बीच तालाब में बना भगवान बुद्ध का मंदिर और इसके सामने बना विशाल पैगोडा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। जल मंदिर तक जाने के लिए तालाब के ऊपर पुल का निर्माण किया गया है। इसमें कछुओं और बतख के साथ ही मछलियों को अठखेलियाँ करते देखना बहुत अच्‍छा लगता है। ठीक सामने मौजूद पैगोडा के ऊपर बँधी घंटियाँ सुरम्‍य और शांत वातावरण में जब बजती हैं तो लगता है कि ये सभी दिशाओं में अहिंसा और प्रेम का संदेश दे रही हों।

९. बिरला मंदिर-

जलमंदिर के सामने भगवान शिव को समर्पित बिरला मंदिर मौजूद है। दक्षिण भारतीय शैली में बने इस मंदिर में शिव की ध्‍यान मुद्रा में सफेद संगमरमर की मूर्ति है। इसके बगल में ही बिरला धर्मशाला है।

कैसे पहुँचें-

कुशीनगर गोरखपुर से 52 किलोमीटर की दूरी पर नेशनल हाईवे नं 28 पर स्‍थित है। यहाँ पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्‍टेशन गोरखपुर रेलवे जंक्‍शन है। गोरखपुर से हर घंटे कुशीनगर (कसया) के लिए बसें मिलती रहती हैं। गोरखपुर से देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों के लिए ट्रेन की सुविधा उपलब्‍ध है। इसके साथ ही गोरखपुर से दिल्‍ली, मुंबई और कोलकाता के लिए हवाई सुविधा भी उपलब्‍ध है। दिल्‍ली और लखनऊ से पर्यटन विभाग की ओर से भी विदेशी और घरेलू पर्यटकों के लिए वाहन और रहने की व्‍यवस्‍था की जाती है।

कहाँ ठहरें...

कुशीनगर में सैलानियों के ठहरने के लिए हर श्रेणी के आरामदायक होटल मौजूद हैं। यहाँ लोटस निक्‍को होटल, होटल रेसीडेंसी और पथिक निवास में ठहरने के लिए बेहतर होगा कि पहले से बुकिंग करवा ली जाए। इनमें से पथिक निवास उत्‍तरप्रदेश पर्यटन विकास निगम की ओर से संचालित होता है। वहीं धर्मशालाओं में भी सालभर भीड़ रहती है। इसमें बिरला धर्मशाला और बुद्ध धर्मशाला प्रमुख हैं। इसके अलावा अलग-अलग देशों के मंदिरों की धर्मशाला भी हैं। बौद्ध भिक्षुओं के लिए लिए कुछ मंदिरों में विहार की व्‍यवस्‍था है।

6 comments:

Anonymous said...

It's a very good effort to create interest in Hindi literature among people. All the you have projected on this blog seems very & realistic. I wish you all the luck in taking it to great hieghts..........

RAM AWTAR YADAV.........

सागर नाहर said...

वाह भाई बहुत बढ़िया कहानी सुनवाई..आप इतने प्रेम से आमंत्रण दे रहे हैं तो जरूर कुशीनगर आयेंगे। :)
आपका हिन्दी चिट्ठों की दुनिया में स्वागत है।

॥दस्तक॥
गीतों की महफिल
तकनीकी दस्तक

नारदमुनि said...

wah jee wah, sair ka aanand aa gya
narayan narayan

रचना गौड़ ’भारती’ said...

आपका हर्दिक स्वागत है ।
कविता गज़ल के लिए मेरे ब्लोग पर पधारें ।

समीर यादव said...

स्वागत है आपका...शुक्रिया.

Anonymous said...

Dear Ambrish aapne bahut hi achchhi tarah Kushi nagar ka sair karaya lekin jisne ek baar Aushi nagar dekh liya hai ,jaise ki main to aisa lagta hai ki abhi bahut kuchh baki hai hai likhne ko.aapko lakh lakh badhai.
Ashok Kumar Singh Suryavanshi
Ahirouli dan
Kushi nagar
Uttar Pradesh
274409