10-Nov-2008

देवरिया, भारत के उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक शहर । (मेरा घर)




देवरिया (Deoria) :-
आइए, पहले "देवरिया" को जानने की कोशिश करें । देवरिया यानि देवताओं का एरिया (क्षेत्र) । परिभाषा थोड़ी अटपटी लग रही है क्या ? अरे भाई ! बिल्कुल नहीं । क्योंकि अपनी जो हिन्दी है न , उसमें किसी भी भाषा के शब्द को अपने में समाहित करने की शक्ति है क्योकि शब्द तो ब्रह्म है और ब्रह्म ब्रह्म में समाहित है । अपने देश को ही लें जिसकी पहचान है, अनेकता में एकता । सदियों से अपनी संस्कृति, अपने संपर्क में आनेवाली प्रत्येक संस्कृति को अपने में समाहित कर लेती है । हजारों शब्द आपको हिन्दी में मिल जाएँगे जो अलग-अलग भाषा के शब्दों से मिलकर बने हैं । उदाहरण के तौर पर देखें तो लाठीचार्ज, जो समय-समय पर अपनी सरकार कराती रहती है । तो जी हाँ, मुद्दे पर आते हैं जैसे 'लाठीचार्ज' बना वैसे ही बन गया 'देवरिया' ।
दरअसल मुझे लगता है कि यह नाम कोई ईश्वर भक्त अंग्रेज ने दिया होगा । जब उसने इस क्षेत्र का दौरा किया होगा तो हर जगह, हर गाँव में उसे काली माई, भवानी माई, बेलही भवानी, बरमबाबा, डिहुआर बाबा (डिह बाबा), नेटुआबीर बाबा (अवश्य नेटुआ होंगे या नेटुआ जाति (अनुसूचित) द्वारा पूजे जाते होंगें), जनहरी बाबा आदि ग्राम देवियों एवं देवताओं के थान (मंदिर या पिंडी) या शाम को किसी गाँव में बारात निकलते समय दूलहे और उसकी माँ को किसी कुएँ, देवथान आदि की परिक्रमा करते हुए देखा होगा और बरबस उसके मुँह से निकल गया होगा देवरिया ।
कुछ विद्वान 'देवरिया' की उत्पत्ति 'देवारण्य' या 'देवपुरिया' से मानते हैं ।


जनपद की बोली भोजपुरी :-
भोजपुरी केवल बोली ही नहीं अपितु देवरिया की जनता के दिल की आवाज़ है, उनका जीवन है और है उनका घर-संसार । भोजपुरी उनके कामों में, उनके व्यवहारों में एवं उनके पहनावों में झलकती है ।
खैर भोजपुरी तो वह बोली (तबतक भाषा नहीं कहुँगा जबतक सरकार द्वारा इसको यह अधिकार न मिल जाए) है जो बहरा भी सुन लेता है और गूँगा भी बोल लेता है । इसमें सरलता एवं सहजता की मिठास है और हैं हृदय को झंकृत कर देने वाले मीठे एवं कर्णप्रिय शब्द । भोजपुरी बोली हो या क्षेत्र हो या हो भोजपुरिया मनई, सब तो प्रेम के भूखे हैं, सबको मिला लेते हैं और सब में घुलमिल जाते हैं । भोजपुरी की सरलता और मधुरता का कारण है सबको पूर्णता प्रदान करना । यह प्रत्येक क्षेत्र में अपूर्ण को संपूर्ण में बदलने की क्षमता रखती है ।इसके सभी शब्द पूर्ण हैं और जो पूर्ण नहीं हैं वे पूर्ण हो जाते हैं । जैसे :- रामकृष्ण- रामकिसुन, ब्रह्मा पाण्डेय- बरमहा पाणे, लक्ष्मी माई- लक्षमी माई, रामानंद- रामानन, विष्णु- बिसनु, ईश्वर- ईसवर, कम्प्यूटर- कमपूटर और डाक्टर (कुछ अंग्रेजी के जानकार लोग उच्चारण के आधार पर डॉक्टर लिखते हैं जिससे मेरा सहमत होना आवश्यक नहीं है)- डाकटर हो जाता है । इस बोली की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है मात्राओं का कम से कम प्रयोग । जैसे :- पैसा- पइसा /पयसा, जैसा- जइसा, मौसी- मउसी, चौका- चउका बाप-दादों की सुने तो देवरिया, देउरियाँ हो जाता है । इस देउरियाँ से एक और बात दिमाग में कौंधी और वह यह है कि हमारे क्षेत्र की गँवई जनता अधिकतर वा,या (आ) से समाप्त होने वाले शब्दों को अनुस्वार के साथ उच्चारित करती है, जैसे:- पथरदेवा को पथरदेवाँ (एक छोटा शहर है), अब यहाँ यह मत कहिएगा कि अवश्य यहाँ पत्थरों की बहुत पूजा होती होगी), तरकुलवा को तरकुलवाँ (एक छोटा शहर शायद तरकुल के पेड़ों की अधिकता के कारण यह नाम पड़ा हो) ,मदरिया को मदरियाँ (एक गाँव), सोचना को सोंचना, नोचना को नोंचना इत्यादि ।
देवरिया जनपद :-
ऐतिहासिक दृष्टि से देवरिया कौशल राज्य का भाग था । जनपद के विभिन्न भागों में बहुत सारे पुरातात्विक अवशेष मिले हैं जैसे :- मंदिर, मूर्तियाँ, सिक्के, बौद्धस्तूप, मठ आदि । बहुत सारी कथाएँ भी इसकी प्राचीन गतिशील जीवनता को सत्यापित करती हैं । कुशीनगर जनपद जो कुछ साल पहले तक देवरिया जनपद का ही भाग था का पौराणिक नाम कुशावती था और भगवान राम के पुत्र कुश यहाँ राज्य करते थे और भगवान बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली भी यही है । देवरिया का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है । देवरिया जनपद के रुद्रपुर में प्रसिद्ध प्राचीन शिवलिंग है जो बाबा दुग्धेश्वर के नाम से ग्रंथों में वर्णित है और इस क्षेत्र की जनता जनार्दन इनको बाबा दुधनाथ के नाम से पुकारती है । इतिहास की माने तो रुद्रपुर में रुद्रसेन नामक राजा का किला था और इसी कारण यह रुद्रपुर कहलाया पर मेरे विचार से भगवान रुद्र (शिव) की पुरी (नगरी) होने के कारण इसका नाम रुद्रपुर पड़ा होगा । सरयू नदी के तट पर बसे बरहज की धार्मिक महत्ता है । दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ आते हैं । स्वतंत्रता संग्राम में भी देवरिया पीछे नही रहा और अंग्रेजों के विरुद्ध बिगुल फूँक दिया । शहीद रामचंद्र इण्टरमिडिएट कालेज बसंतपुर धूसी (तरकुलवा) के कक्षा आठ का एक छात्र बालक रामचंद्र ने देवरिया में भारतीय तिरंगे को लहराकर शहीद रामचंद्र हो गया और सदा के लिए अमर हो गया ।
देवरिया ब्रह्मर्षि देवरहा बाबा, बाबा राघव दास, आचार्य नरेंद्र देव जैसे महापुरुषों की कर्मभूमि रहा है । गोरखपुर जनपद का यह तहसील १९४६ में पृथक होकर एक जनपद के रूप में अवतरित हुआ और तब से विकास के पथ पर अग्रसर है । देवरिया जनपद लगभग २५२७.२ किलोमीटर में फैला है और कृषि प्रधान क्षेत्र है। घाघरा, राप्ती और गंडक नदियों ने इसकी उपजाऊ क्षमता को बढ़ाया है । इस जनपद की मिट्टी सोना उगलती है ।फसलों में मुख्य रूप से धान, गेहूँ, गन्ना, मक्का, आलू, द्विदलीय अन्न (अरहर, मटर, चना, मूँग इत्यादि), तिलहन (सरसों, राई, तीसी, सूर्यमुखी इत्यादि), खरबूज, तरबूज, ककड़ी, खीरा, हर प्रकार की मौसमी सब्जियाँ (भिंडी, टमाटर, मूली, प्याज, नेनुआ, करैला, तिरोई, कोहड़ा, लौकी, भंटा इत्यादि), सागों में कई प्रकार के साग विशेषकर जैसे पालक,चौंराई (चौराई), सनई, भथुआ इत्यादि । खेतों में ग्रामीण महिलाओं एवं किशोरियों को भथुआ को खोंटते (तोड़ते) हुए देखा जा सकता है । भथुआ को खोंट-खोंटकर ये लोग अपने फाड़ (साड़ी के किनारे या दुपट्टे को कमर में लपेटकर बनाई हुई थैली) में रखती जाती हैं ।
देवरिया जनपद देवरिया सदर, भाटपार रानी, रुद्रपुर,सलेमपुर और बरहज इन ५ तहसीलों में विभाजित है । विकास खंडों की संख्या १६ है:- देवरिया, भटनी, सलेमपुर, भाटपार रानी, बैतालपुर, रुद्रपुर, लार, गौरीबाजार, बनकटा, भागलपुर, देसही देवरिया, भलुवनी, बरहज, रामपुर कारखाना, पथरदेवा और तरकुलवा (हाल में ही तरकुलवा विकास खंड बना है) ।
शिक्षा के मामले में भी देवरिया बहुत आगे है, लगभग १०-१२ डिग्री कालेजों के साथ-साथ कई तकनीकी विद्यालय हैं । दर्शनीय स्थानों में गायत्री मंदिर, हनुमान मंदिर, सोमनाथ मंदिर, देवरही मंदिर (देवरिया शहर में) , मझौली राज का किला (सलेमपुर), मईल, बैकुंठपुर, रुद्रपुर आदि । भगवान बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली कुशीनगर, देवरिया शहर से ३४ कि.मी. पर स्थित है ।

देवरिया जनपद : भाषा एवं धर्म:-
देवरिया जनपद में मुख्य रूप से हिन्दी भाषा बोली जाती है ।देवरिया जनपद की कुल जनसंख्या की लगभग ९६ प्रतिशत जनता हिन्दी, लगभग ३ प्रतिशत जनता उर्दू और एक प्रतिशत जनता के बातचीत का माध्यम अन्य भाषाएँ हैं । बोली की बात करें तो ग्रामीण जनता के साथ-साथ अधिकांश शहरी जनता भी प्रेम की बोली भोजपुरी बोलती है । कुल जनसंख्या की दृष्टि से इस जनपद में लगभग चौरासी प्रतिशत हिन्दू, लगभग पंद्रह प्रतिशत मुस्लिम और एक प्रतिशत अन्य धर्म को मानने वाले हैं । इस जनपद की जनता आपस में प्रेम-भाव से रहते हुए सबके दुख-सुख में सहभागी बनती है । या यूँ कहें "देवरिया जनपद रूपी उपवन को हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौद्ध आदि पुष्प अपनी सुगंध से महकाते हैं और ये सुगंध आपस में मिलकर पूरे भारत को गमकाती है ।"


देवरिया जनपद : मानचित्रित स्थिति:-

भारत में देवरिया जनपद :- भारत के उत्तर प्रदेश का यह जनपद उत्तर प्रदेश प्रांत के उत्तर-पूर्व सीमा पर स्थित है । इसके उत्तर में कुशीनगर जनपद जो पहले इसी जनपद का भाग था स्थित है । पूर्व में इसकी सीमा बिहार के दो जिले (जनपद) गोपालगंज व सिवान को स्पर्श करती है । दक्षिण में यह, जनपद मऊ एवं जनपद बलिया से घिरा हुआ है तथा इसके पच्छिमी छोर पर गोरखपुर जनपद स्थित है ।
जनपद का मुख्यालय:- देवरिया जनपद का मुख्यालय देवरिया शहर में है जो गोरखपुर से ५२ किलोमीटर पूर्व में विराजमान है । देवरिया शहर पर अगर एक नजर डालें तो पाएँगें कि यह शहर बहुत कम समय में तेजी से विकास किया है । इस शहर में तीन महाविद्यालय (बाबा राघवदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, संत बिनोवा स्नातकोत्तर महाविद्यालय एवं राजकीय महिला महाविद्यालय), ६-७ इंटरमीडिएट कालेज, २-३ तकनीकी विद्यालय और बहुत सारे माध्यमिक एवं प्राथमिक विद्यालय हैं जो इसकी ज्ञान गरिमा को मंडित कर रहे हैं । इस शहर में कई धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थान हैं जो इसकी धार्मिकता एवं ऐतिहासिकता को गौरवान्वित करते हैं । देवरिया रेल द्वारा सीधे गोरखपुर और वाराणसी से जुड़ा हुआ है । देवरिया सदर (रेलवे स्टेशन) से प्रतिदिन दिल्ली, मुम्बई जाने के लिए कई रेलगाड़ियाँ है तथा देश के कुछ अन्य प्रांतों में जाने के लिए भी । देवरिया पूरी तरह से सड़क मार्ग से भी भारत के अन्य भागों से जुड़ा हुआ है । देवरिया शहर के बस स्टेशन से लगभग आधे-आधे घंटे पर गोरखपुर के लिए बसें जाती हैं तथा इसके अलावा बहुत सारी निजी (प्राइवेट) सवारियाँ भी मिल जाएँगी । देवरिया से दिल्ली, बनारस, कानपुर, लखनऊ, अयोध्या आदि के लिए भी प्रतिदिन कई सारी बसें चलती हैं ।
नदियाँ एवं नाले :- देवरिया जनपद को मुख्य रूप से घाघरा,राप्ती और छोटी गंडक (नदियाँ) हरा-भरा बनाती हैं पर कभी-कभी इनके रौद्र रूप (बाढ़) में किसानों की खुशहाली (फसलें) बह जाती है । नदी माताओं के रौद्र रूप को शांत करने के लिए इनकी आराधना भी की जाती है । इन नदियों के अलावा कुर्ना, गोर्रा, बथुआ, नकटा आदि नाले भी बरसात में उफन जाते हैं और क्षेत्र की जनता को अपने होने का एहसास कराते हैं ।
देवरिया के परिचीत शहर :- देवरिया जनपद के जाने-माने शहरों में देवरिया, बैतालपुर, गौरीबाजार, रामपुर कारखाना, पथरदेवा, तरकुलवा, रुद्रपुर, बरहज (बरहज में चार महान तीर्थों का समावेश है जो "बरहज" नाम में भी अपना बोध करा रहे हैं, ब = बद्रीनाथ, र = रामेश्वरम्, ह = हरिद्वार, ज = जगन्नाथ धाम), भलुअनी, भाटपाररानी, बनकटा, सलेमपुर, लार, भागलपुर, भटनी, महेन आदि हैं ।
मौसम :- समशीतोष्ण । कुल मिलाकर ठीक-ठाक । जाड़ा, गर्मी, बरसात, तीनों हैं यहाँ बराबर के हिस्सेदार । पर मई-जून की गर्मी और ऊपर से लू । इनसे बचने के लिए सर पर गमछा होना आवश्यक और पेय पदार्थों में बेल का रस और सतुई । जनवरी, फरवरी आदि में अच्छी ठंडक के साथ-साथ कुहा जो कभी-कभी सूर्य को कई-कई दिन तक निकलने ही नहीं देता है और वाहन अपनी बत्ती जलाकर सड़कों पर रेंगते हैं । इस ठंड से बचने के लिए गाँवों में लोग कंबल आदि ओढ़कर या गाँती बाँधकर कौड़ा (आग) तापते हैं और रात को जल्दी ही माँ निद्रा की गोद में चले जाते हैं । रजाई, स्वेटर, मफलर आदि रात-दिन शरीर की शोभा बढ़ाते हैं । इस मौसम में होरहा खाने और कचरस (गन्ने का रस) पीने का मजा ही कुछ और होता है । जुलाई-अगस्त में बरसा रानी झमाझम बरसती हैं और किसान हर्षित होकर धान की रोपाई में भिड़ जाता है । एक बात और बरसात के मौसम में कभी-कभी किसी की बारात में शामिल होना यादगार बन जाता है, पत्तल में मेढ़क कूदते नजर आते हैं और कभी-कभी आँधी, तूफान भी तंबू को उड़ा ले जाते हैं ।
कृषि :- जी हाँ, कृषि इस जनपद का प्राण है । रबी (गेहूँ आदि) और खरीफ (धान आदि) बहुतायत में पैदा होता है । गन्ना तो किसानों का पुत्र है जो इनको मुद्रा लाभ कराता है । इस जनपद में गन्ने की खेती भी अधिकता से होती है । इस जनपद की मिट्टी कई प्रकार की है जैसे:- दोमट,बलुई दोमट,भाठ,मटियार और बलुई (बहुत कम)। इस क्षेत्र में नहरों का जाल फैला हुआ है । सिंचाई के लिए नहरों के अलावा नलकूप, बोरिंग (पम्पसेट द्वारा) और तालाब आदि का उपयोग किया जाता है । सरकार द्वारा हर किसान को निःशुल्क बोरिंग उपलब्ध कराया गया है । सब मिलाजुलाकर जनपद देवरिया एक संपन्न क्षेत्र है । यहाँ के लोग प्रशासन में ऊँचे-ऊँचे पदों की शोभा भी बढ़ाते हैं, प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय में शिक्षा भी देते हैं, और अपने दूसरे भारतीय भाइयों के साथ सीमा पर भारत माँ की सजगता से रक्षा भी करते हैं । इस जनपद के कुछ लोग रोजी-रोटी की जुगाड़ में देश के बड़े-बड़े नगरों और विदेशों में भी रहते हुए इस क्षेत्र की धरती से जुड़े हुए हैं । भारतीय राजनीति में भी इनका अच्छा-खासा योगदान है ।
गाँव सुधरेगा, देश सुधरेगा । किसानों की खुशी में ही माँ भारती की खुशी है । भ्रष्टाचार,भाई-भतीजावाद,क्षेत्रवाद अगर हटेगा तो शत-प्रतिशत भारत विश्व के मस्तक पर सजेगा ।

देवरिया जनपद : सच्चे लोकहितैषी:-

देवरिया कई जननायकों की कर्मस्थली रही है । ये जननायक तो अपने समय में पूरे राष्ट्र में छाए हुए थे पर देवरिया के प्रति इनका विशेष लगाव था । ये जननायक देवरिया के विकास के लिए कठिन तप किए और देवरिया जनपद की जनता को बहुत सारे कष्टों से निजात दिलाते हुए उनके लिए विकास का मार्ग प्रशस्त किए । आज भी देवरियाई जनता के हृदय में इन महापुरुषों के प्रति अपार आदर और प्रेम है । इन सच्चे लोकहितैषियों में जो नाम देवरिया की जनता जनार्दन के हृदय-पटल पर छा गया है, वह नाम है :-

बाबा राघवदास। इस लेख को आगे बढ़ाने के क्रम में मैं पूर्वान्चल के इस गाँधी को हृदय से नमन करता हूँ । आइए संक्षेप में इस महापुरुष की महानता को प्रणाम करें ।

बाबा राघवदास :- बाबा राघवदास का जन्म १२ दिसम्बर १८९६ को पूणे (महाराष्ट्र) में एक संभ्रान्त ब्राह्मण परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम श्री शेशप्पा और माता का नाम श्रीमती गीता था । इनके पिता एक नामी व्यवसायी थे । बाबा राघवदास के बचपन का नाम राघवेन्द्र था । राघवेन्द्र को बचपन में ही अपने परिवार से सदा के लिए अलग होना पड़ा क्योंकि राघवेन्द्र का हरा-भरा परिवार प्लेग जैसी महामारी की गाल में समा गया । १९१३ में १७ वर्ष की अवस्था में राघवेन्द्र एक सिद्ध गुरु की खोज में अपने प्रान्त को अलविदा कर दिए और प्रयाग, काशी आदि तीर्थों में विचरण करते हुए गाजीपुर (उत्तरप्रदेश का एक जनपद) पहुँचे जहाँ उनकी भेंट मौनीबाबा नामक एक संत से हुई । मौनीबाबा ने राघवेन्द को हिन्दी सिखाई । गाजीपुर में कुछ समय बिताने के बाद राघवेन्द बरहज (देवरिया जनपद की एक तहसील) पहुँचे और वहाँ वे एक प्रसिद्ध संत योगीराज अनन्त महाप्रभु से दीक्षा लेकर उनके शिष्य बन गए । १९२१ में गाँधीजी से मिलने के बाद बाबा राघवदास स्वतंत्र भारत का सपना साकार करने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए तथा साथ ही साथ जनसेवा भी करते रहे । स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस कर्मयोगी को कई बार जेल की हवा भी खानी पड़ी पर माँ भारती का यह सच्चा लाल विचलित न होते हुए पूर्ण निष्ठा के साथ अपना कर्म करता रहा । १९३१ में गाँधीजी के नमक सत्याग्रह को सफल बनाने के लिए राघवबाबा ने क्षेत्र में कई स्थानों पर जनसभाएँ की और जनता को सचेत किया । बाबा देवरियाई जनता के कितने प्रिय थे, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि १९४८ के एम।एल.ए. (विधायक) के चुनाव में उन्होंने प्रख्यात शिक्षाविद्ध, समाजसुधारक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आचार्य नरेन्द्र देव को पराजित किया । बाबा राघवदास ने अपना सारा जीवन जनता की सेवा में समर्पित कर दिया । उन्होंने कई सारे समाजसेवी संस्थानों की स्थापना की और बहुत सारे समाजसेवी कार्यों की अगुआई भी । १५ जनवरी १९५८ को माँ भारती का यह सपूत, जनता का सच्चा सेवक अपनों से विदा लेकर ब्रह्म में विलीन हो गया । बोलिए बाबा राघवदास की जय । भारत माता की जय ।

देवरिया जनपद : संतस्थली (देवरहा बाबा)

योगिराज देवरहा बाबा :- देवरिया सुप्रसिद्ध संत ब्रह्मर्षि योगिराज देवरहा बाबा की कर्मस्थली रह चुकी है । देवरिया क्षेत्र की जनता हार्दिक रूप से शुक्रगुजार है उस परम मनीषी, योगी की जो देवरिया क्षेत्र को अपना निवास बनाया, इस क्षेत्र की मिट्टी को अपने पावन चरणों से पवित्र किया और अपने ज्ञान एवं योग की वर्षा से श्रद्धालु जनमानस को सराबोर किया । इस योगी की कृपा से देवरिया जनपद विश्वपटल पर छा गया । देवरहा बाबा ब्रह्म में विलीन हो गए लेकिन उनके ईश्वरी गुणों की चर्चा करते हुए आज भी श्रद्धालु अघाते नहीं हैं ।
देवरहा बाबा के भक्तों की सूची में महान राजनीतिज्ञ माननीया स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गाँधी से लेकर माननीय अटल बिहारी बाजपेयी तक हैं । जनता जनार्दन की सुने तो देवरहा बाबा एक परम सिद्ध महापुरुष थे, इसमें कोई दो राय नहीं ।
निवास :- देवरहा बाबा के मूल निवास के बारे में लोगो में भ्रम है पर ऐसा कहा जाता है कि देवरहा बाबा कहीं बाहर से आए । देवरहा बाबा ने देवरिया जनपद के सलेमपुर तहसील में मइल (एक छोटा शहर) से लगभग एक कोस की दूरी पर सरयू नदी के किनारे एक मचान पर अपना डेरा डाल दिया और धर्म-कर्म करने लगे ।
व्यक्तित्व :- बहुत ही कम समय में देवरहा बाबा अपने कर्म एवं व्यक्तित्व से एक सिद्ध महापुरुष के रूप में प्रसिद्ध हो गए । बाबा के दर्शन के लिए प्रतिदिन विशाल जन समूह उमड़ने लगा तथा बाबा के सानिध्य में शांति और आनन्द पाने लगा । बाबा श्रद्धालुओं को योग और साधना के साथ-साथ ज्ञान की बातें बताने लगे । बाबा का जीवन सादा और एकदम संन्यासी था । बाबा भोर में ही स्नान आदि से निवृत्त होकर ईश्वर ध्यान में लीन हो जाते थे और मचान पर आसीन होकर श्रद्धालुओं को दर्शन देते और ज्ञानलाभ कराते थे ।
बाबा की लीला :- अब आइए थोड़ा बाबा के ईश्वरी गुणों पर चर्चा की जाए । श्रद्धालुओं के कथनानुसार बाबा अपने पास आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से बड़े प्रेम से मिलते थे और सबको कुछ न कुछ प्रसाद अवश्य देते थे । प्रसाद देने के लिए बाबा अपना हाथ ऐसे ही मचान के खाली भाग में रखते थे और उनके हाथ में फल, मेवे या कुछ अन्य खाद्य पदार्थ आ जाते थे जबकि मचान पर ऐसी कोई भी वस्तु नहीं रहती थी । श्रद्धालुओं को कौतुहल होता था कि आखिर यह प्रसाद बाबा के हाथ में कहाँ से और कैसे आता है ।लोगों में विश्वास है कि बाबा जल पर चलते भी थे और अपने किसी भी गंतव्य स्थान पर जाने के लिए उन्होंने कभी भी सवारी नहीं की और ना ही उन्हें कभी किसी सवारी से कहीं जाते हुए देखा गया । बाबा हर साल कुंभ के समय प्रयाग आते थे । लोगों का मानना है कि बाबा को सब पता रहता था कि कब, कौन, कहाँ उनके बारे में चर्चा हुई ।
हमारे बाबाजी (दादा) पंडित श्रीरामवचन पाण्डेय बताते हैं कि एक बार वे कुछ लोगों के साथ बहुत सुबह ही देवरहा बाबा के दर्शन के लिए पहुँचे और ज्योहीं मेरे दादाजी और अन्य भक्तों ने देवरहा बाबा को प्रणाम किया त्योंही देवरहा बाबा ने मेरे दादाजी की ओर इशारा करते हुए कहा कि भो पंडित कीर्तन सुनाओ । मेरे दादाजी ने कहा कि बाबा मुझे कीर्तन नहीं आता । इसपर देवरहा बाबा ने कहा कि 'हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे...' यह भी तो कीर्तन ही है फिर सभी श्रद्धालुओं ने मिलकर नामकीर्तन किया ।
काफी दिनों तक देवरिया में रहने के बाद देवरहा बाबा वृंदावन चले गए । कुछ समय तक वहाँ रहने के बाद देवरहा बाबा सदा के लिए समाधिस्त हो गए । बोलिए संत शिरोमणि देवरहा बाबा की जय ।

देवरिया : संगीत के दिग्गज महारथी:-

आइए, आपलोगों का परिचय देवरिया जनपद के मझौली राज निवासी, एक ऐसे मिश्रा परिवार से कराता हूँ, जिसका प्रत्येक सदस्य अपने समय में एक प्रख्यात संगीतज्ञ रह चुका है । श्री पुदन मिश्र - श्री पुदन मिश्र अपने समय के एक सुप्रसिद्ध सारंगी वादक एवं मनीषी थे । इनकी गणना सर्वश्रेष्ठ सारंगी-वादकों एवं मनीषियों में थी । माँ सरस्वती का यह अमर पुत्र युवावस्था में ही काल के गाल में समा गया । श्री तमाखू मिश्र - श्री तमाखू मिश्र श्री पुदन मिश्र के छोटे भाई थे और अपने अग्रज श्री पुदन मिश्र की असामयिक मृत्यु से शोकाग्रस्त परिवार को उबारने के लिए तत्परता से संगीत साधना में जुट गए । श्री तमाखू मिश्र की कठिन तपस्या फलीभूत हुई और सोहना रागिनी को सिद्ध करके संगीत-जगत में ये सूर्य की भाँति चमकने लगे । श्री मथुरा मिश्र - श्री मथुराजी मिश्र श्री पुदनजी मिश्र एवं श्री तमाखूजी मिश्र के पोते थे । श्री मथुराजी मिश्र एक धार्मिक प्रवृत्ति के विद्वान थे । मथुराजी मिश्र ठुमरी, धमार, ध्रुपद, खयाल, टप्पा आदि में पूर्णरुपेण निपुण थे तथा संगीत जगत में इनका एक विशेष स्थान था । इनकी विद्वता से प्रभावित होकर मझौलीराज के महाराज ने इन्हें अपना दरबारी गायक नियुक्त किया था । श्री मथुरा मिश्र के पुत्र श्री मनमोहन मिश्र एक कुशल गायक होने के साथ ही साथ एक सिद्धहस्त सारंगीवादक भी थे । श्री मनमोहन मिश्र के पुत्र श्री रामप्रसाद मिश्र संगीत के सुप्रसिद्ध विद्वान हुए और इनके समय में ठप्पा, ठुमरी गायन में इनका कोई शानी नहीं था । श्री रामप्रसाद मिश्र एक कुशल सारंगीवादक भी थे । इसी घराने में जन्मे श्री गोकुल मिश्र ने अपनी कठोर साधना से तबलावादन क्षेत्र में अपना विशेष स्थान बनाया। श्री गोकुल मिश्रजी प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक सूर्य की दिशा में खड़े होकर कमर में तबले को जोड़ी बाँध कर कठिन साधना करते थे । श्री गोकुल मिश्र अपने समय में काशी के प्रसिद्ध तबला-वादकों में से एक थे । माँ सरस्वती के इन अमर पुत्रों ने संगीत-जगत में एक मर्यादित एवं विशेष स्थान बनाने के साथ ही साथ देवरिया जनपद को भी गौरवान्वित किया और इस क्षेत्र की संगीत प्रियता एवं विद्वता से पूरे देश से परिचित कराया । माँ सरस्वती के इन मनीषी पुत्रों को कोटि-कोटि प्रणाम ।

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