01-Dec-2008

लेख !!

लश्कर-ए-तैबा: जिसने हमें दिए कई गहरे जख्म

(6 Dec 2008, 0214 hrs IST,नवभारत टाइम्स )

मुंबई में देश पर हुए अब तक के सबसे भयानक आतंकवादी हमले में एक बार फिर उसी पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन का हाथ होने का खुलासा हुआ है, जिसने भारत को पहले भी आतंक के एक से बढ़कर एक गहरे जख्म दिए हैं। हम बात कर रहे हैं दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठनों में से एक लश्कर-ए-तैबा की। दुनिया भर में प्रतिबंध लगने के बावजूद इसका खूनी खेल बदस्तूर जारी है। कब और कैसे वजूद में आया लश्कर और क्या है इसका मकसद,

आइए जानते हैं: किसने, कहां की स्थापना:-

लश्कर-ए-तैबा का मतलब 'खुदा की फौज' या 'नेक, ईमानदार व धार्मिक लोगों की सेना' होता है। इसकी स्थापना दो दशक पहले हाफिज मोहम्मद सईद ने अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में की थी। पहले लाहौर के पास इसका मुख्यालय था जो बाद में मुजफ्फराबाद शिफ्ट हो गया। पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में कई ट्रेनिंग कैंप चला रहा है यह संगठन।

क्या है इसका इतिहास:-

1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के समर्थन वाली नजीबुल्ला सरकार के खिलाफ लड़ने के निए लश्कर को सीआईए और आईएसआई का शुरुआती समर्थन मिला था। अफगानिस्तान से सोवियत संघ के वापस हटने के बाद सीआईए ने अपना समर्थन बंद कर दिया, लेकिन आईएसआई का समर्थन जारी है। अमेरिकी सरकार ने कुनाड (अफगानिस्तान) में लश्कर के गुरिल्ला ट्रेनिंग कैंप के गठन में सहयोग दिया था। अफगानिस्तान में सोवियत संघ के समर्थन वाली सरकार के खिलाफ अफगानी आतंकवादी संगठनों को प्रशिक्षित करने के लिए सीआईए ने लाहौर के समीप मुरीदके में लश्कर का बेस कैंप बनवाने में मदद की जो 80 एकड़ में फैला था। लश्कर दरअसल मरकज-उद-दावा-वल-इरशाद (एमडीआई) का मिलिट्री विंग है। एमडीआई पाकिस्तान का एक कट्टर धार्मिक संगठन है। इसका बेस मुरीदके में है और इसका अध्यक्ष हाफिज मोहम्मद सईद है। सईद लश्कर का 'अमीर' भी है। वह अभी जमात-उद-दावा के नाम से चैरिटी चलाता है और इसका मुखिया भी है। इसकी दो स्वतंत्र शाखाएं हैं। एक इस्लाम का प्रचार करता है जिसका अध्यक्ष सईद है। दूसरा, मौलाना अब्दुल वाहिद कश्मीरी के नेतृत्व में कश्मीर और अन्य जगहों पर अपनी हिंसक गतिविधियों को अंजाम देता है।

क्या है इसका मकसद:-

लश्कर का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया, रूस और चीन में भी इस्लाम का प्रभुत्व स्थापित करना है। इसके अलावा कश्मीर मुद्दे पर भारत की संप्रुभता को चुनौती देना है। साथ ही, इसका मकसद पाकिस्तान के आसपास वाले देशों में मुस्लिम बहुल इलाकों को एकजुट करना भी है।

किसने संभाली है बागडोर :-

लश्कर का हेडक्वॉर्टर 2001 तक लाहौर के पास था, लेकिन जमात-उद-दावा से अलग होने और राजनीतिक दबाव के कारण कश्मीर को आजाद कराने के मकसद से मुजफ्फराबाद (पाक अधिकृत कश्मीर) शिफ्ट कर दिया गया। इसने एक नए जनरल काउंसिल का भी गठन किया है। इसमें मौलाना अब्दुल वाहिद कश्मीरी (सुप्रीम लीडर) और जाकी-उर-रहमान लखवी (जम्मू-कश्मीर का सुप्रीम कमांडर) हैं। इसके अलावा काउंसिल के अन्य सदस्यों में अब्दुल्ला (अनंतनाग, इस्लामाबाद), हाजी मोहम्मद आजम (पुंछ), मुजम्मिल बट (डोडा), मोहम्मद उमेर (बारामुला), चौधरी अब्दुल्ला खालिद चौहान (बाग), रफीक अख्तर (मुजफ्फराबाद), आफताब हुसैन (कोटली), फैसल डार (श्रीनगर), चौधरी यूसुफ (मीरपुर) और मौलाना मोहम्मद शरीफ बालघरी (बलतिस्तान) हैं। ये सभी जिला कमांडर हैं। सईद तो ऑर्गनाइजेशन का हेड है, लेकिन बताया जाता है कि इसका ऑपरेशनल चीफ सैफुल्ला है।

कौन है इसका रहनुमा:-

पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजंसी आईएसआई से इसे लगातार सहयोग मिलता रहा है। अल कायदा से भी इसे इमदाद मिलती है। पहले तो यह संगठन मस्जिदों और दुकानों के सामने चंदा बॉक्स रखकर पैसे जुटाता था। लेकिन 2002 के बाद से इसने चैरिटी के नाम पर ब्रिटेन, भारत, खाड़ी के देशों, गैर-इस्लामिक एनजीओ और पाकिस्तानी और कश्मीरी कारोबारियों से धन इकट्ठा करना शुरू किया। भूकंप प्रभावितों के लिए भी राशि जुटाई गई। लेकिन चैरिटी के नाम पर जुटाए गए धन का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों में किया गया।

साहब हम आम लोग हैं हमे घर चलाना होता है ।

दिल में एक आक्रोश दबा हुआ है जिसे निकाल नहीं पा रहा हूँ शब्द कम पड़ रहे हैं किससे कहूँ ये बातें कौन लाएगा हमारे लिय संजीवनी ढूँढ के इन पंगु राजनीतिज्ञों पर विश्वास करना हमारी सबसे बड़ी मुर्खता होगी राजनीति की रोटियां ही सेंकी जायेगी इनके गलियारानो में हम और आप दो-चार दिन चिल्ला के फिर लग जायेंगे अपने काम पर और बहाना भी लाजबाब अरे साहब हम आम लोग हैं हमे घर चलाना होता है अरे जब घर ही नहीं होगा तो चलाएंगे क्या ? बस अब इन आतंकवादियों को जो अपने को जेहादी कहते हैं सबक सिखाना ही पड़ेगा इन्हें बताना ही होगा की हम भारतवासी सहनशील, धैर्वान और अमन-पसंद के प्रेरणास्त्रोत रहे हैं और हम बर्दाश्त नहीं करेंगे अगर कोई हमसे यह छिनने की कोशिश भी करे आइये हम सब मिलकर आज यह सपथ लेते हैं की इन्हें ऐसे नहीं बख्शेंगे इन्हें तो हम मटियामेट करके ही दम लेंगे। वन्देमातरम् !!

आतंकवादी कौन??

शायद यही यक्ष प्रश्न पूछ रहे हैं हम एक दुसरे से की आखिर कौन है ये आतंकवादी कहा से आते हैं ये ?? कौन देता है इनको ये हौसला की ये कूद पड़ते हैं मौत का सामन लेकर अपने साथ तमाम मासूमों के जान के साथ खिलवाड़ करने के लिए और देश के नायब धरोहर हमारे जांबाज सिपाहियों को शहादत के लिए मजबूर करने वाले, मैं आप सब से यही प्रश्न पूछता हूँ सही मायनों में कौन है आतंकवादी कौन हैं देश के गद्दार ? आतंकवादी कौन सा मजहब है, मैं किसी खास वर्ग या कौम को भी दोषी नहीं ठहराता हूँ जेहाद के नाम पर आतंक फैलाने वाले और अपने को जेहादी कहने वालो को कौन बताये की जेहाद का अर्थ आतंकवाद कदापि नहीं होता। जेहाद का मतलब सेवा और संघर्ष होता है

मुंबई दहली, देश दहला। लगातार तीन दिन तक देश के जांबाजों ने जान पर खेलकर ताज, ओबेराय और नरीमन हाउस को आतंकियों से मुक्त कर आमची मुंबई भारत को सौंप दिया। इस दौरान हम जैसे आम नागरिक असीम व्यथा, बेचैनी और संत्रास के बीच खुद को पा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि यह हो क्या गया। कुछ इस तरह जैसे इसकी कभी कल्पना भी किसी ने न की होगी। अब शीर्ष स्तर पर कई कवायदें हो रही हैं। एसपी के बदले पीसी गृह मंत्री बना दिये गये हैं। मुंबई के बड़बोले मुख्यमंत्री और गृह मंत्री को बदलने की बातें चल रही हैं। वे निर्लज्ज की तरह कह रहे हैं- इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं पैदा होता- और इसी तरह कई डेवलपमेंट्स हो रहे हैं। अब जाकर पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम का समझौता तोड़ने, एलओसी पर पर्याप्त फौज भेजने, बस और ट्रेन सेवा रद करने की बात हो रही है। भारत का जनवरी में होनेवाला पाक दौरा रद्द कर दिया गया है। कई गतिविधियां चल रही हैं। पर दो सौ नागरिकों के हताहत होने और २४ सुरक्षाबलों की शहीदी के बाद। इसके पहले भी आतंकी हमले हुए हैं, पर सरकार ने कुछ नहीं किया।




कब तक चलता रहेगा आतंकी तांडव?

मुंबई। जब-जब मुंबई सहित समूचे देश में सीरियल बलास्ट होते हैं तो बेगुनाह लोग मारे जाते हैं एवं घायल होते हैं।
हमेशा सरकार जांच करवाने में जुट जाती है। मरने वालों एवं घायलों के लिये मुआवजा की घोषणा की जाती है और दो-चार दिनों में सबकुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन इन आतंकी हमलों में जो मानवीय संवेदनाएं टूटती हैं,
उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती । हर हमले में कई ऐसे वाकये सामने आते हैं, जिसको सुनकर दिल दहल जाता है।
आखिर कब तक यह आतंकी तांडव चलता रहेगा? क्यूँ बार-बार हमारा खुफिया तंत्र नाकाम साबित हो रही है। आज यह सवाल सभी के दिलों में कौंध रहा है। मन को दहला देने वाले कई ऐसी घटनाएं हैं,
जिसके बारे में बस कहा और लिखा ही जा सकता है। आम लोगों को यह पता नहीं होता कि हमला किधर से होगा। आलम यह है कि घर से निकलने एवं घर वापस लौटने तक लोगों के दिलों में आतंकी घटनाएं की याद ताजा रहती है और वे खौफजदा रहते हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक मुंबई सहित समूचे देश में आतंकी तांडव मचता रहेगा, कब तक यह खुनी खेल चलता रहेगा?





2 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

इन नेताओं में तो अब जंग चुका

अब खुद ही अपने भारत के लिए जंग लड़े हम।

jayaka said...

Aapake vichaaron ke saath mai sehmat hun!...aise netaon par hum kitana bharonsa kar sakaten hai?