15-Dec-2008

यक्ष प्रश्न (?)

कल यानी की इतवार के दिन मैं घर पर ही था, कुछ दोस्त भी आए हुए थे भोजन करने के बाद मित्र मंडली बैठी तो चर्चा शुरू हो गई अरे वही आम चर्चा जो अक्सर बहस का कारण बन जाता है नही समझे तो बता ही देता हूँ क्रिकेट और राजनीति, हमारे देश में सबसे ज्यदा चर्चा इन्ही विषयो की ही तो होती है , क्रिकेट की बातें कुछ जल्दी ही ख़तम हो गई अब बारी आई राजनीति की और फिर शुरु हुआ घमासान जो थमने का नाम ही नही ले रहा था मेरे मित्र मण्डली में एक ख़ास मित्र थे जो हाल-फिलहाल अमेरिका से लौटे हैं और वहीँ एक सॉफ्टवेर कंपनी में कार्यरत हैं, सबसे ज्यदा बोलने वालों में वो भी थे मैं बहूत देर तक मूक दर्शक बन कर सबको सुन रहा था की अचानक हमारे अमेरिकन (so called) मित्र अपने राग में शुरु हो गए की मैं एक जिम्मेदार भारतीय हूँ और एक सच्चा राष्ट्र भक्त भी इतना तो ठीक था किन्तु जब उन्होंने आगे बोलना शुरू किया तो बस रुके ही नहीं मुझसे भी नही रहा गया और मैं बोल पड़ा-- महाशय बड़ी ही व्यंगात्मक बात कही आपने, कम से कम आप जैसे महानुभावों के मुखारबिंदु से ऐसी तल्ख़ भरी बातें सोभनीय तो बिलकुल ही नहीं है जो कर्तव्य परार्णयता की बड़ी बड़ी दुदुम्भी फूंकते तो रहते हैं और करते कुछ नहीं हैं अपितु अपने ही लोगों को गालियाँ देते हैं और खुद अमेरिका की गुलामी करते हैं अपने वक्तव्य के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ किन्तु यह एक कड़वी सच्चाई है जिसे आप माने या ना माने हमारे मित्र जो की बहूत ही गंभीर मुद्रा में आ गए थे ने अपने तरकश से तीर निकली और बौछार कर डाली ---- जहाँ तक मेरा ख़याल है मैं एक आम नागरिक हूँ अपना कर समय पर देता हूँ, चोरी बेईमानी नहीं करता हूँ, सरकारी सम्पति की चोरी नहीं करता हूँ, किसी भी अत्याचार का विरोध करता हूँ, शायद इन सबके बाद भी आपको लगता है की मुझे और कुछ कारन चाहिए तो कृपया कर बताने का कष्ट करे, हिदुस्तान की तरक्की और खुशाली हर हिन्दुस्तानी के तरह मेरा भी सपना है, आपको इन देशो को देखना चाहिए जिनकी (आपके अनुसार मैं गुलामी करता हूँ) इन लोगो नें अपने देश को अपने हाथो से तराशा है जब हम लोग आपस में भाषा, धर्म के नाम पर लड़ रहे होते है तो ये लोग इमानदारी से अपने फर्ज निभाते हैं, अपना देश शुरू से ही जयचंदों से घिरा रहा रहा है, जो देश अपने लोगो को खाना तक नहीं दे सकता है, क्या आपको अंदाजा है कितने लोग भारत में रोज़ भूखे पेट सोते है, कैसे उस राष्ट्र को महान राष्ट्र कहा जा सकता है जिसके नागरिक सुरक्षित नहीं है, खुशहाल नहीं हैं , अब मेरी बारी थी मैंने कहना शुरू किया -- महाशय आपके भावनाओ का मैं सम्मान करता हूँ और हाँ मैं आपके तर्कों से सहमत हूँ परन्तु ये बताइए कहा से आयेंगे वो क्रांतिकारी जो एक दिन में क्रांति लाकर हमारे देश की आर्थिक राजनैतिक और सामजिक परिस्थितियों को एकदम से बदल के रख देंगे, मुंबई हमले के बाद से अब तक पता नहीं कितने लोगों ने मीडिया के जरिये या फिर अपने कलम के जरिये कितना कुछ बोला और लिख होगा की हमे ये करना चाहिए हमे वो करना चाहिए लीजिये थोड़ा सा हिस्सा मैं भी जोड़ता हूँ और पूछता हूँ यही यक्ष प्रश्न ख़ुद से भी और आप सबसे भी की भाई हम सभी अपनी दाल-रोटी के जुगाड़ में ही रहेंगे तो फिर बैठे रहिये इसी मुगालते की भूख, गरीबी,भ्रष्टाचार और बेईमानी के विरुद्ध ज़ंग लड़ने के लिये स्वर्ग से हमारे लिए शहीद ऐ आज़म भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु,और विश्मिल्ह खां जैसे शुर-वीर आयेंगे और हमारे लिये अमन-चैन, शान्ति, भाईचारा का इन्कलाब लाकर हमे बैठे बिठाये एक महान राष्ट्र घोषित करके चले जायेंगे । मेरे इतना कहने के बाद मित्र अभी कुछ बोलते उससे पहले ही उन्हें एक जरुरी फ़ोन आ गया और उन्होंने मुझसे जाने की इजाजत ली हमने सभा का विसर्जन किया और सबने घर के लिए पतली गली ले ली किंतु मेरा प्रश्न मेरा यक्ष प्रश्न (?) बन कर रह गया
भगत सिंह की लिखी एक पंक्ति याद आ रही है दोहरा देता हूँ --------


उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है
दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,
चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें
सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें ।

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