13-Mar-2009

बंधन

आज जब मैं उस सुनहरे अतीत के गलियारों में चहलकदमी करता हूँ तो मुझे यह सोचकर आश्चर्य होता है की वह कौन सी डोर है जो हमें तमाम उतार चढाव के वावजूद एक दुसरे से जोड़े हुए है| जहाँ तक मेरी सोच और समझ है ये बंधन प्रेम का बंधन है जो शायद जीवन की आधारशिला है |
जीवन
ही क्यूँ बंधन शायद इस सृष्टि की भी आधारशिला है | सितारे एक-दुसरे से बंधे हैं , ग्रह अपने सितारों से बंधे हैं, उपग्रह अपने ग्रहों से बंधे हैं,परमाणु के भीतर भी इलेक्ट्रान और प्रोटान एक दुसरे से बंधे हैं , पृथ्वी पर हमारा अस्तित्व तभी तक तो है जब तक इसके गुरुत्वाकर्षण ने हमे बाँध रखा है |
पेड़
-पौधे ,जीव-जंतु सभी तो प्रकृति से बंधे हैं | अनादी काल से जीवों में प्रकृति से बंधे रहने की प्रवृति यानि की अपने मूल, अपने उत्त्पति से जुड़ने की प्रवृति | किंतु हम मनुष्यों ने इस आलौकिक बंधन को अपने भौतिक इक्छाओं और स्वार्थों के वशीभूत होकर यानी की आशक्ति से इसे ढक लिया है |
यहीं से जीवन का समीकरण गडबडाने लगता है| हम मनुष्य स्वार्थ में इतने अंधे हो गए हैं की प्रेम,बंधन,लगाव,अनुभूतियाँ ,उदगार, खुशी जैसे शब्दों के मायने जैसे बदल गए हों या यूँ कहे की ये शब्द जैसे खो से गए हैं समय बदल गया है रिश्तों की परिभाषा बदल गई है , व्य्स्तात्यें बढ़ गई है , हालाकि रिश्तों की अहमियत आज भी बरकरार है जैसे - माँ-बेटा , भाई-बहन, पति-पत्नी , लेकिन संबंधों में वो मिठास वो लगाव कहीं जाता रहा है कहीं गुम सा हो गया है........

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