15-Sep-2009

आंखों में सहमे हुए मंज़र तो दिखाएँ
बहारों से लदी शाख बनाएं ,
और दूर उधर रेत की दीवार थी
दीवार के उस पार सपनो का अद्व्तवी भंवर था

उलझते गए हम सपनो में .....
खो गए हम अपनों में
उस रेत के दीवार को दिया हमने बिसार
पर वो नही बिसार सका हमको

उसने दिखा दिया कारामात.......
सारी खुशियाँ, सारे सपने तादीब बन गयी
नहीफ पड़ गए सारे इरादें
उस दीवार की रुदाद कैसे कैसे बताएं
ऐसे मादुम की तम्बीह को कैसे समझाएं....

कर दे हम पर रहम और कर दे बरी
ताकि फिर बहारों से लदी शाख बनाएं.....

"कामना सिंह बघेल"








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