07-Oct-2009

"कुछ खट्टी- मीठी यादें"

कितना चंचल एवं मासूम होता है बचपन जितना यादों को समेटने की कोशिश करो उतने ही गहरे उतरते चले जाते हैं । जिंदगी में दो ही चीज़ें हम याद रखते हैं एक तो वह जो हमें सुकून देती है दूसरी जो हमें तकलीफ देती है। गाहे-बगाहे मुझे भी बचपन की कुछ खट्टी मीठी यादें , आपसी तकरार वो बाबा से एक दुसरे की शिकायत करना ,वो क्रिकेट का ग्राउंड जहाँ पहुचने की जद्दोजहद में हम स्कूल से आने के बाद खाना खाना भी भूल जाते थे, रविवार का पूरा दिन क्रिकेट ग्राउंड पर बिता देना... अब लगता है जैसे काश हम उन पुराने दिनों में दुबारा वापस जा सकते किन्तु अब तो बस हम उन्हें यादों में ही जिन्दा कर सकते हैं, यादें अनमोल होती हैं जो अक्सर चेहरे पर मुस्कान ला देती हैं और कभी कभी मन में करवाहट भी भर देती हैं यादें अनायास ही मन में छूट जाया करती हैं हम यह भी नही तय कर सकते की किन यादों को जेहन में बसने दें और किन्हें भूल जाएँ क्यूंकि यादओं पर किसी का वश नही चलता है ।
कल रात सपने में भैया को देखा क्या देखा यह कुछ ठीक से याद नहीं है, मगर उसमें उन बचपन के दिनों की झलक थी जो कहीं मन के सूदूर कोने में जड़ जमाये बैठी है.. सुबह नींद सात बजे ही खुल गई, जबकी मैं अमूमन नौ बजे बिस्तर छोड़ता हूं.. मैंने आज भी बिस्तर नौ बजे ही छोड़ा मगर जब तक लेटा रहा तब तक भैया के बारे में ही सोचता रहा.. कुछ बचपन की बातें तो कुछ किशोरावस्था की यादें.. एक-एक करके कई सीन नजर के सामने से यूं गुजर रहे थे जैसे कोई पैरेलल सिनेमा देख रहा हूं.. अमोल पालेकर वाला.. भकुवाया हुआ सा मन था और मैं अपने सर पर तकिया दबाये उस सिनेमा का नजारा देख रहा था जो मेरे दिल के बहुत पास है....
शायद एक साल से ज्यादा हो गया भैया से बात नहीं हुई है.. अधिकांशतः कोशिश मेरी तरफ़ से ही होती है किन्तु बात नही हो सकी वजह जो भी हो, ये बात तो साफ़ है कि वो बहूत ही नाराज है और हमसे कोइ सम्बन्ध नही रखना चाहते है और बात ना करके हमारे प्रति उनके मन मे जो नफ़रत और कड़वाहट की मैल जम गई है उसे बयां कर रहे हैं, मै उनसे कोइ शिकायत करूँ भी तो कैसे किस हक से शायद अपने जिन्दगी मे आये तमाम उत्तार-चढाओ , अकेलेपन और बुरे वक्तो के लिये हमे ही दोषी मानते हैं , हो सकता है की उनकी ये सोच जायज हो लेकिन पुरी तरह से बिल्कुल भी नही, कहीं ना कहीं वो भी इसके लिये खुद जिम्मेदार है और ये बात या तो वो मानने को बिल्कुल तैयार नही हैं और इस दोष को हमारे सर पर मढ़ कर अपने को उन्होने दोषमुक्त कर लिय है लेकिन वो नही जानते की ये उनकी एक कवित्व्मय भूल है मुझसे बड़े होने के नाते ये उनका कर्तव्य बनता है की इन बातो पर वह पुनः विचार करें, हमसे दूर होकर उन्होने हमे बहूत दुख दिया है मै उनसे कोई गिला-शिकवा ना रखते हुए बस इतना ही कहूँगा की हम सब उन्हें हर पल याद करते हैं दिल मे ये बात एक जख्म का रुप ले चुका है की वो आज हमारे साथ नही हैं मेरी ये पोस्ट मेरे भइया मनीष को ही समर्पित है मैं उन्हें इसके जरिये बस इतना ही याद दिलानाचाहता हूँ की आज भी वो हमारे दिल के करीब रहते हैं ।
भैया को लेकर मुझे जो सबसे पुरानी याद है वो गोरखपुर की है॥ मैं शायद चार-पांच साल से ज्यादा का नहीं रहा होऊंगा और भैया आठ-नौ साल के॥ भैया पाचवी मे और मै पहली दर्जे मे थे, भैया और मै उस दिन स्कूल से लौट कर जेब खर्च के लिये मिले पैसे से मोहद्दीपुर चौराहे पर चाकलेट खरीदने के लिए पहुच गए हमारे घर के गेट से निकलते ही सामने एक मौलवी साहब का घर था जिन्होंने एक कुत्ता पाल रखा था और मेरे भईया कुत्तों से बहूत डरते थे और सयोंग देखिये मौलवी साहब का कुत्ता जैसे हमारे ही इन्तजार में बैठा था भईया उसे देख कर भागने लगे मैं बिलकुल शांत होकर वही पर रुक गया मौलवी साहब का कुत्ता पीछे-पीछे और भईया उसके आगे-आगे भईया दौड़ते-दौड़ते अपने गेट पर पहुच गए किन्तु गेट बंद होने की वजह से तुंरत अन्दर ना जा सके कोशिश की मगर खोल नहीं पाये और कुत्ते ने उन्हें अपना शिकार बना डाला । भैया बाहर बहुत देर तक रोते
रहे उसके बाद बाबा ने इंजेक्शन लगाया था बस इतना ही याद है, बाद में हमने उस कुत्ते को पागल करार दे दिया और उसके बाद से हमने मिलकर प्लानिंग किया उस कमीने कुत्ते को कैसे मौत के घाट उतर दिया जाए शायद हमने अपने प्लानिंग पर कई बार काम किया किन्तु असफल रहे फिर हमने एक फुल प्रूफ़ प्लानिंग किया और इस बार हमने उस नामुराद कुत्ते को मौत की नींद सुला के ही दम लिया...

1 comment:

Luv said...

I so intresting to read the paragraph