17-Jun-2011

ढूढंता है ...

अब अपने किराये के कमरे को ही घर कहता हूँ
मेरा घर भी अब मेरी ही तरह खो चूका है अपनी पहचान
घर में अब कोई नहीं रहता, वहां अब ख़ामोशी बसती है, अँधेरा जगमगता है
वो कमरें जो गूंजती थी किलकारियों से रौशन होती थीं ठहाकों से और महकती थीं मोहब्बत से
अब तब्दील हो गयी हैं थार के रेगिस्तान में

एक बुड्ढा अब भी रहता है वहां, यह वही बुड्ढा है
जिसने ढ़ोया है इस घर को अपने मजबूत कन्धों पर
वो कंधें अब झुक गए हैं और घर भी उन कन्धों को छोड़ गिरने को आतुर है

यह बुड्ढा कभी एकदम जवान था
उम्र तो तब भी थी उसकी अस्सी की
पर जवानी जो बसती थी उन्ही किलकारियों,हंसी,ठहाकों
और हंसी से लबरेज़ घर की दीवारों में
वो शायद जा चूँकि हैं या खो गयी हैं
बुड्ढा अब ढूँढता भी नहीं उन्हें
उसे यकीन ही नहीं होता की अब नहीं रहा अस्तित्व उनका

पर हाय रे वात्सल्य!
हाय रे प्रेम
अडीग,अस्थिर,अविचल सा पड़ा है
हाँ अब बस साँसे ही बाकी रह गई हैं
पर फिर भी है उसे उम्मीद
आज भी ढूँढता है क़दमों के निशाँ
कोशिश करता है सुनने की हर वो आहट
जिससे गुमाँ होता है उन खनकती आवाजों का
उन किलकारियों का ...

शायद चाहता है किसी के प्राणमयी प्रेमालिंगन को
जो उसे फिर से जिवीत कर दे

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