25-Dec-2011

मन ! तेरी गति कितनी विचित्र है, कितनी रहस्य से भरी हुई, कितनी दुर्मेध | तू कितनी जल्दी रंग बदलता है | इस कला में तू निपुण है | आतिशबाज की चरखी को भी रंग बदलते कुछ देर लगती है, पर तुझे रंग बदलने में उसका लक्षांश समय भी नहीं लगता !

मुंशी प्रेमचंद की निर्मला पढ़ रहा हूँ, करीब ५ साल पहले आधी पढ़ी थी और पुस्तक एक महिला मित्र ने रख ली थी और विडम्बना ये की उन्हें पुस्तकों से कोई लगाव भी नहीं था |पूछ नहीं पाया की उन्होंने मेरी अधूरी पढ़ी पुस्तक को पूरा पढ़ा या नहीं |

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