28-Feb-2012

                   "अधूरी कविता"

रात गुज़ार दी कविता के शब्दों के साथ
सुबह ने जाने कब दस्तक दे दी,
 अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी
मैं खोया रहा अपने भूत, वर्तमान, भविष्य की कविता में |

नींद काफूर है आँखों से,
शब्द वाक्य, और वाक्यों ने धर  लिया है रूप कविता का
शब्दों को सजाया था रात भर मैंने
 पिरोया था बखूबी एक-एक करके |

ना जाने क्यूँ फिर भी लगा जैसे,
 कहीं कुछ छूट गया है
 बिखर गया है
 रह गयी मेरी कविता पूरी होने से
अभी भी ये अधूरी है.......

“अम्बरीष”





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