11-Jun-2012

मन में पीड़ा है, बेचैनी है, द्वंद् है, ईर्ष्या है अब क्योंकि जो है वही बाहर आएगा एहसास इतना घनीभूत और प्रबल हैं की अंतरात्मा पर वश ही नहीं होता, धड़कने जैसे रुक रुक कर चलती हैं, दिल में हमेशा एक शूल सा धंसा रहता है | बहुत कोशिश की इस मानसिक असंतुलन से खुद को उबार लूं और सामन्य हों जाऊं कई उपाय किये और कई बार महसूस भी हुआ की अब घुल गयी है पीड़ा की कुछ सर्द लकीरें मेरे अंतरमन में किन्तु अंततः सब धाराशाई हो गए और मैं लौट कर वापस आ जाता हूँ उसी मनोस्तिथि में | काश हमारे शारीरिक तंत्रजाल में भी माइक्रोसाफ्ट विंडोस़ की तरह एक निश्चित रिस्टोर पॉइंट पर खुद को रिस्टोरे करने की क्षमता होती तो शायद मैं इस वेदना के एहसास को मिटा सकता, इश्वर से यही शिकायत है, उन्हें बिल गेट्स से थोड़ा सबक लेकर इस सम्बन्ध में थोड़ा विचार करना चाहिए| कितनी सामन्य रूप से जिए जा रहा था जिंदगी यदि कोई हर्षोल्लास नहीं था तो बहुत गम भी नहीं था लेकिन नहीं रास नहीं आ रही थी यूँ नीरस होकर जीने की ये अस्वभाविक प्रक्रिया| इंसानी फितरत हम परिवर्तन चाहते हैं, खुशियाँ चाहिए, प्रेम चाहिए, जीत चाहिए और सबसे ऊपर कुछ अधिक आदर्शपूर्ण स्थिती चाहिए, महत्त्वपूर्ण होने का एहसास कैसे जाने दे सकते हैं | जीत मिली पर हर जीत में हारता रहा , प्रेम मिला किन्तु बड़ा ही निष्ठुर और खुशियाँ मिली कुछ पल के लिए पर जाते जाते विष ही छोड़ गईं | एक परम दयालु मित्र की कृपा से एक नाटक देखने का अवसर प्राप्त हुआ नाम था "जाती ही पूछो साधू की" यह एक व्यंग था हमारे समाज के ठेकेदारों द्वारा बनाये गए उलटे और पूर्णतया खोखले बेबुनियादी नियमों पर | नाटक का नायक प्रोफ़ेसर महिपत बब्रुआहन (ऍम. ए. ,तृतीय श्रेणी) से मैंने कुछ सीख ली और घर आकार सोचा की अब मैं थोड़ा ठीक हूँ, लेकिन ये तृष्णा इतनी आसनी से कहाँ मिटेगी ये क्षण-भंगुर नहीं है | फेसबुक पर सभी मित्रों के साथ अपनी मानसिक व्यथा व्यक्त करके किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं बटोरना चाहता हूँ , साझा इसलिए कर रहा हूँ क्यूंकि हम सब किसी ना किसी प्रकार की मानसिक ,शारीरिक यंत्रणा से कभी ना कभी अवश्य गुजरते हैं और इससे निजात पाने के लिए कोई ना कोई उपाय जरुर करते हैं तो मैं भी बस वही कर रहा हूँ इसे लिख कर और सबके साथ बाँट कर, लिखते हुए इस बात का एहसास है की जीवन में संघर्ष हम सब के साथ है और सबको उसका अपना  दुःख दूसरे से ज्यादा लगता है, मेरी कोशिश भी यही रहेगी की जितनी जल्दी हों सके फिर से अपनी पुरानी जिंदगी में वापस चला जाऊं या इस दुनिया के रंग में रंग जाऊं और सही बताऊँ तो रंगना भी चाहता हूँ  है पर अपने संस्कारों को ताक पर रख कृत्रिमता का आडम्बर रच कर नहीं |


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